तुतीकोरिनमध्ये पोलिसांच्या क्रौर्याने मुलाचा आणि वडिलांचा खून, सार्वजनिक आक्रोश
By_Arvind Shesh
तूतीकोरीन की घटना में पुलिस ने वही किया है जो भारत में उसका ‘चरित्र’ आहे! कानून को लागू करने की ड्यूटी पर तैनात किया जाना और अपने इस “पावर” का इस्तेमाल अपनी सामंती और अमानवीय कुंठा के विस्फोट के लिए करना!
लेकिन तूतीकोरीन की घटना में कारण क्या है?
कोरोना, महामारी कानून लागू, लॉकडाउन और लॉकडाउन लागू करने के लिए ‘प्रतिबद्ध’ सरकार की खुली छूट! कोरोना से चिंतित और डरे हुए सारे लोग महामारी कानून और लॉकडाउन के दीवाने हैं! जिन दो लोगों को पुलिस ने पीट-पीटकर मार डाला, वे तो सिर्फ जिंदा रहने के लिए अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे थे न..! करोड़ों लोग इस तड़प में मर-मर कर घिसटते हुए जिंदा हैं! लॉकडाउन या लॉकडाउन के दीवाने क्या उनकी जिंदगी का खर्च उठा सकते थे?
अपनी सुविधा से हम ये देख लेंगे कि “क्या हुआ है”, लेकिन ये नहीं देखेंगे कि “क्यों हुआ है”! और असली अपराधियों की ओर से आंखें मूंद लेंगे! भारत में जो पुलिस और सरकार का जो चरित्र है, वह वही करेगी! हमें ‘क्या’ समझना आता है, ‘क्यों’ समझना हम जरूरी नहीं समझते! या तो डर, या कन्फ्यूजन, या फिर पाखंड हमारा बुनियादी जीवन-मूल्य है!
हा लेख अरविंद शेष यांच्या फेसबुक वॉलवरून घेतला आहे.
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