گھر حالت دہلی قومی دارالحکومت علاقہ کووند کو دھکیلنا ایک اعتراض سے زیادہ سیکھنے کا مسئلہ ہے۔…

کووند کو دھکیلنا ایک اعتراض سے زیادہ سیکھنے کا مسئلہ ہے۔…

-دیپالی ٹیڈے۔

یہ تمام واقعات ہندوستانی سماج میں بہوجنوں کی حیثیت کو ظاہر کرتے ہیں۔ صدر، آپ جتنا چاہیں تلوے چاٹ سکتے ہیں۔, وزیر, سنٹری, کچھ بھی بن جاتا ہے۔, لیکن یہاں آپ کو پست کہا جائے گا۔ پست ہونے کی وجہ سے ایک برہمن کی قسمت میں آپ کے صدر بننے کے بعد بھی ایک چھوٹا سا بوجھ ہے۔ چاہے وہ جگناتھ پوری کا مندر ہی کیوں نہ ہو۔, یا پشکر سے؟…..اگر آپ مزید تطہیر چاہتے ہیں تو جنوب میں مندروں میں جائیں وہاں آپ کو زیادہ خاص علاج ملے گا۔

یہ نہ صرف کووند کے لیے بلکہ ہندوستان کے تمام بہوجنوں کے لیے سبق ہے جو ابھی تک ہندو مذہب کو اپنے سینے سے لگائے ہوئے ہیں۔ ان لوگوں کو بھی جواب دیں۔, جو کہتے ہیں کہ ریزرویشن معاشی بنیادوں پر ہونا چاہیے۔, क्योंकि कोविंद के साथ यह सब आर्थिक आधार पर नहीं जातिगत आधार पर हुआ। ये जवाब है उन लोल सलाम वालों के लिए भी जो अमीरी-गरीबी का चक्कर बता कर वर्ग की बात करते हैं वर्ण की नहीं। और अठावले, उदितराज, रामविलास पासवान, मायावती आदि बहुजन नेताओं के नाम पर छाती पीट-पीट कर हम बहुजनों को गरियाते हैं, उन्हें यह नहीं समझ आता कि कुछ भी बन जायें इनकी बहुजन होने की पहचान और उससे जुड़े विद्वेष से मुक्ति नहीं मिलती इन्हें।

सारे मामले का सबक-

  1. बहुजन हिंदू नहीं हैं। औऱ जो अब भी हिंदू धर्म नहीं छोड़ रहें हैं वो भी समझ लें अपनी औक़ात। वरना हरिजनों तुम्हारी कमर में झाड़ू और गले में हंडी लटकनी तय है। हम बौद्धिस्ट मरे भी तो शान से शहीद होंगे।
  2. पण्डे तुम्हे मंदिरों में आने से नहीं रोके बल्कि तुम मंदिर और ब्राह्मणों दोनों को त्याग दो। मंदिर केवल ब्राह्मणों का मनरेगा है। तुम मंदिर जाना बंद करोगे तो कुछ पैसे जुड़ेंगे कम से कम बच्चों को ढंग का खाना खिला सकोगे।
  3. हिंदू धर्म छोड़ कर अपने बाबासाहेब का दिखाया हुआ बौद्ध धम्म स्वीकार करें प्रज्ञा-शील-करुणा के मार्ग पर चलते हुए अपना दीपक स्वयं बनें। शिक्षित होकर, अपने हक़ों के लिए संघर्ष करो और आंदोलन के लिए संगठित होना सीखो। ये सुनिश्चित कर लें आप, आपका परिवार और अगली सात पुश्तें धर्म के चुंगल में ना फँसे।
  4. مندر,पंडे उस जैसी कोई भी संरचना ट्रस्ट या चैरिटी में अपना एक रूपपल्ली भी ख़र्च ना करें। ब्राह्मण तुम्हारे टुकड़ों पर पलकर ही तुमको अब तक डसते आएँ हैं, कम से कम अब आगे ऐसे ना हो।
  5. ब्राह्मणीय संरचना से यथासंभव अलगाव रखें क्योंकि वो लोग इस लायक नहीं है उन्हें इंसान माना जाए। ब्राह्मणों के धर्म के गुलाम बनने से कई गुना बेहतर है मरना।

इस घटना को बहुजन क्रांति के लिए एक अच्छा संकेत माने और नई शुरुआत कीजिये।

क्रांतिकारी जयभीम

 

مصنف- دیپالی تایاڈے۔

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