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रोजगार - Uncategorized - नोव्हेंबर 16, 2019

शेवटी 40 का वर्षांत प्रथमच ग्राहकांना खर्च पडणे!

सरकारी सर्वे में ये एक नई बात सामने आई है. कि पिछले 40 सालों में पहली बार साल 2017-18 में उपभोक्ताओं की खर्च सीमा में गिरावट देखन को मिली है और इसका प्रमुख कारण ग्रामीण इलाकों में मांग में आई कमी है. बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार भारत में घरेलू उपभोक्ता व्यय नामक राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय एनएसओ की लीक को सर्वे में कथित तौर पर दिखाया गया है. कि किसी भारतीय द्वारा एक महीने में खर्च की जाने वाली औसत राशि साल 2017-18 मध्ये 3.7 फीसदी कम होकर 1446 रुपये रह गई है. जो कि साल 2011-12 मध्ये 1501 रुपये थी.

लेकिन रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों में साल 2017-18 में उपभोक्ताओं की खर्च सीमा में 8.8 फीसदी की गिरावट आई है जबकि इसी अवधि में शहरी इलाकों में दो फीसदी की वृद्धि हुई है. वही विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट दावा करती है कि आखिरी बार 1972-73 में एनएसओ ने उपभोक्ताओं की खर्च सीमा में गिरावट दिखाई थी. हालांकि द वायर लीक हुई एनएसओ सर्वे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर पाया है और बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार संभावित रूप से सबसे खतरनाक खबर यह है कि दशकों में पहली बार भोजन की खपत में गिरावट आई है. वर्ष 2011-12 में जहां ग्रामीण भारतीय भोजन पर औसतन 643 रुपये खर्च करते थे. वहीं साल 2017-18 में यह राशि औसतन घटकर 580 रुपये हो गई है.

दरहसल यह रिपोर्ट छह सालों के अंतराल के बाद आई है जिसके कारण यह साफ नहीं है कि उपभोक्ताओं के खर्च में यह गिरावट वास्तव में कब हुई. इसका मतलब है कि या तो यह गिरावट पिछले कई सालों से होती चली आई है या फिर हाल में हुई अचानक गिरावट हो सकती है जिसके लिए नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों को जिम्मेदार माना जा सकता है. और एनएसओ खपत सर्वे को जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच किया गया है और इसे जून 2019 में एक आधिकारिक समिति ने प्रकाशित करने के लिए मंजूरी दे दी थी. क्योंकि आंकड़े अनुकूल न होने के कारण मंजूरी मिलने के बाद भी रिपोर्ट को दबा दिया गया.

जिसमें एनएसओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण को पांच महीने पहले एक बैठक में एनएससी द्वारा गठित एक कार्य समूह द्वारा मंजूरी दी गई थी और सर्वेक्षण रिपोर्ट द्वारा दिखाए जा रहे गिरते उपभोक्ता खर्च से चिंतित सरकार ने आंकड़ों पर गौर करने के लिए एक उप-समिति का गठन किया था. वही सूत्रों के अनुसार उप-समिति ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में सरकार को बताया कि सर्वेक्षण में कोई खराबी नहीं थी.

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