घर भाषा हिंदी दलित कार्यकर्ते नौदीप कौर यांचे आज सुनावणी, सोशल मीडियावर सोडण्याची मागणी!

दलित कार्यकर्ते नौदीप कौर यांचे आज सुनावणी, सोशल मीडियावर सोडण्याची मागणी!

हरियाणातील दलित कामगार कार्यकर्त्या नौदीप कौरचे प्रकरण, राष्ट्रीय, आंतरराष्ट्रीय स्तरावर पोहोचला आहे. नौदीपची अटक पूर्ण झाली 27 दिवस संपले. नौदीपचा जामीन दोनदा फेटाळण्यात आला असला तरी.. ज्याची आज न्यायालयात सुनावणी होणार आहे. लेकिन प्रगतिशील मीडिया ने एक बार भी नौदीप के खिलाफ आवाज नहीं उठाई…क्या एक महिला का दलित समाज से आना उसकी आवाज को दबाने जैसा है.. हालांकि हमने इस बारे में करनाल पुलिस थाने में बातचीत की लेकिन उन्होने इस मामले में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया.

दलित कार्यकर्ता नौदीप कौर एक वामपंथी संगठन के बैनर तले विरोध कर रही थीं, लेकिन जब पुलिस ने उनको गिरफ्तार कर और छेड़छाड़ की..तो इनमें से किसी ने भी इस मामले को देखने की जहमत नहीं उठाई. नोदीप को बस के नींचे फेंक दिया गया था और यह सभी दलित हैं जो इन जनेऊ कामरेडों के तहत काम करना चाहते हैं.. वे आपको ट्रॉफी के रूप में यह दिखाने के लिए उपयोग करेंगे कि वे कैसे समावेशी हैं और आपको मुसीबत की पहली नजर में छोड़ देंगे..अपने खुद के साथ रहना बेहतर है और एक “दलित” कम्युनिस्ट होने के बजाय एक अम्बेडकरवादी बने रहें जो एक हाउस एन के लिए एक और शब्द के अलावा कुछ भी नहीं है क्योंकि आखिरकार, यह कॉमरेड नहीं थे जिन्होंने उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज उठाई, यह हम थे डीबीए लोग यानि दलित, बहुजन और आदिवासी लोगों ने ही नौदीप की गिरफ्तारी और हिरासत की हिंसा पर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हैं.


इस मुददे पर सवाल करते हुए डॉ मनीषा बांगर जो समाजिक चिंतक और राजनीतिक विश्लेषक अपने FB वॉल पर शेयर करते हुए लिखते है कि सरकार नवदीप कौर को रिहा क्यों नहीं कर रही ? क्यों नवदीप कौर को बेल नहीं मिल रही ?
तमाम किसान संगठन चुप क्यों है? कम्युनिस्ट संगठन जिसकी वो मेंबर थी वो खामोश क्यों है?#नवदीप #navdeepkaur #release_nodeepkaur_challengeहालंकि सोशल मीडिया पर #resalesNavdeepKaur ट्रेंड कराया जा रहा है ताकि जल्दि रिहा किया जा सके….लिहाजा हमारी टीम ने नौदीप के फैमलि से भी बात करने की कोशिश कि लेकिन हमारा समपर्क नहीं हो पाया…मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक नौदीप हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली है और 23 साल की दलित मजदूर अधिकार कार्यकर्ता और मजदूर अधिकार संगठन (MSA) की सदस्य है .


नौदीप कौर के परिजनों ने कहा है कि उनकी रिहाई के लिए वे पंजाबहरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे है. चार दिन पहले ही सोनीपत के सत्र न्यायालय ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था…लेकिन तहकिकात में पता चला और द वायर की रिपोर्ट के अनुसार नोदीप कौर के रिश्तेदारों ने कहा कि वह कुंडली में एक कारखाने में काम करना शुरू करने के बाद मजदूर अधिकार संगठन के साथ जुड़ गई थीं. साथ ही उनका ये भी कहना है ‘पंजाब के मुक्तसर में मजदूर परिवार में जन्मीं कौर स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेना चाहती थीं, लेकिन जब उनके परिवार को आर्थिक परेशानी हुई तो उन्हें रोजगार की तलाश करनी पड़ी.’


आगे इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि हाईकोर्ट के एक वकील से मिलने के लिए चंडीगढ़ जाने के दौरान कौर की बहन राजवीर ने कहा, ‘हमने प्रक्रिया शुरू कर दी है. मेरी बहन के खिलाफ आरोप झूठे हैं.’उन्होंने आरोप लगाया, ‘नवदीप नवंबर 2020 में सिंघू बॉर्डर पर (किसानों के) आंदोलन में शामिल हुई थीं. वह उन मजदूरों के लिए भी लड़ रही थीं, जिन्हें नियमित रूप से मजदूरी नहीं मिलती थी…12 जनवरी को वह कुंडली में एक कारखाने के पास विरोध कर रही थीं जब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था.नौदीप कि बहन आगे कहती है कि मैं उनसे मिली और उन्होंने मुझे बताया कि हिरासत में उसके साथ मारपीट की गई है.’ साथ ही राजवीर ने कहा कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहीं थी लेकिन दिसंबर में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने किसानों के साथ विरोध करना शुरू कर दिया था.’वही इस केस पर काम कर रहे राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के दिल्ली चैप्टर के अध्यक्ष एडवोकेट अमित श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि स्टेशन पर पुलिसकर्मियों द्वारा उनके साथ मारपीट की गई है.


लेकिन हैरानी इस बात पर है कि किसी किसान नेता ने इस बच्ची के हक में एक शब्द नहीं कहा है….आन्दोलन के नेताओं का इस तरह की गिरफ्तारियों से मुंह फेरकर निकल जाना कोई यह नेताओं वाला रव्वैया नहीं है…और कई लोग जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आवाज़ उठाते है उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती…क्या इस बात से यही समझा जाय कि एक दलित लड़की होने के नाते इन्हें सजा मिल रही है…हालंकि नौदीप जो मजदूरों की लड़ाई लड़ रही थी उसको गिरफ्तार कर पुलिस का ऐसा दुर्वयवहार…मनुवादी मीडिया का न बोलना…क्या संघियों का साथ देना …और दलित की आवाज दबाने के जैसा है.

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