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Human Rights - Political - 2 weeks ago

सफाईकर्मचारियों के साथ होता भेदभाव, इसका जिम्मेदार कौन?

कोरोना महामारी के बीच जिस तरह से हमारे देश के कोरोना योद्धा चाहे वो डॉक्टर हो, नर्स हो, सफाईकर्मचारी हो इस महामारी में अपनी डयूटी निभा अपनी जान की बाजी लगा लगातार काम कर रहे है. जिसके लिए नेशनल इंडिया न्यूज इन सबका आभार व्यक्त करता है. लेकिन जिस तरह से सफाईकर्मचारियों के साथ आए दिन प्रताड़ित करने की खबरें लगातार आ रही है वो बेहद ही निंदनीय है.

कुछ दिनों पहले ही उत्तर प्रदेश मेंबहुजनों पर हो रहे अत्याचार की एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई थी । सफाई कर्मचारी को मार कर शव को पेड़ से लटका दिया गया था । अब हाल ही में गुजरात के जामनगर से महिला सफाई कर्मी से मारपीट का मामला सामने आया है। मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक गुजरात के जामनगर जिले के सिविल अस्पताल के कुछ कर्मचारियों ने महिला सफाई कर्मचारी को जातिसूचक गालियां दी। इस सबके चलते बात हाथापाई पर उतर आई| विवाद को देखते हुए मौके पर पुलिस को बुलाया गया। समस्या का निवारण करने के बजाय पुलिसकर्मियों ने महिला सफाई कर्मियों का सिर फोड़ दिया। इस घटना के बाद महिला खून से लालों-लाल हो गई| यह सब देख भारी मात्रा में लोग घटनास्थल पर जमा हो गए| विवाद को देखते हुए लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी और घटना की वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दी।

गुजरात के एमएलए जिग्नेश मेवानी ने वायरल हुई वीडियो को ट्विटर पर शेयर करते हुए पुलिसकर्मियों पर एफ आई आर दर्ज करने की मांग भी की है।

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार 27 मई को हरियाणा में सफाई कर्मचारियों ने मांगे पूरी न करने पर काली पट्टियां बांधकर विरोध जताया।एसकेएस ब्लॉक प्रधान ईश्वर सच्चाखेड़ा ने कहा कि स्वास्थ्य ठेका कर्मचारियों व अन्य विभागों से निकाले गए कर्मचारियों को वापस ड्यूटी पर लेने, स्वास्थ्य विभाग सहित आवश्यक सेवाओं को निर्बाध चलाने और कोरोना संक्रमण को रोकने में किसी भी प्रकार से ड्यूटी दे रहे। इसलिए अगर किसी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मौत हो जाती है तो उसके लिए 50 लाख रुपये मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को पक्की नौकरी दी जाए। इसके अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के शीघ्र ठोस कदम उठाने, कर्मचारियों एवं पेंशनर्स को वैक्सीनेशन करने, कोरोना बचाव के लिए सुरक्षा किट उपलब्ध करवाने, ठेका प्रथा समाप्त कर कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने, बंद किए गए डीए व पुरानी पेंशन को बहाल करने की सरकार से मांग है।

वहीं आज 28 मई को भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद ने भी ट्वीट कर लिखा है कि हाल में जामनगर, गाजियाबाद, लखनऊ में सफाईकर्मियों को प्रताड़ित किया गया। दिल्ली सरकार उन्हें मुआवजा देने में भेदभाव कर रही है। जान हथेली पर रखकर देश की सेवा करने वाले कोरोना योद्धाओं के साथ यह जुल्म करने वालो पर कड़ी कार्यवाही हो। देशव्यापी आंदोलन के लिए सरकारें हमे मजबूर ना करे।

इसके साथ वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल भी अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते है कि कोरोना योद्धा सफ़ाई कर्मचारियों की इस दौर में तमाम तरह से अनदेखी हो रही है। देश के अलग अलग हिस्सों में सफ़ाई कर्मचारियों का ग़ुस्सा फूट रहा है। सरकारें अगर समय उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करती है तो हालात बिगड़ सकते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली के नगर निगमों में स्थायी और अस्थायी समेत करीब 50 हजार सफाई कर्मचारी हैं, जो कूड़ा इकट्ठा करने का काम करते हैं. कोरोना वायरस फैलने के बाद से ये कर्मचारी स्वच्छता के काम में हाथ बंटा रहे हैं. आंकड़ों से पता चलता है कि दक्षिण एमसीडी में 29 में से 16, उत्तरी एमसीडी में 49 में से 25 और पूर्वी एमसीडी में 16 में से 8 मौतें सफाई कर्मचारियों की हुईं हैं.

हाल ही में सफाईकर्मचारियों की हुई कोरोना से मौत को लेकर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल से 1 करोड़ रुपये के मुआवजा की मांग की जा रही थी. जिसपर पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ रामू लिखते है कि सफाई कर्मचारियों की जान सबसे सस्ती- दिल्ली के तीन मुंसिपल कॉर्पोरेशनों के मरने वाले कमर्चारियों में आधे सफाई कर्मचारी कोरोना से कुल मरे 95 कर्मचारियों में 49 सफाई कर्मचारी हैं, इनमें सिर्फ एक या दो को केजरीवाल द्वारा घोषित 1 करोड़ की क्षतिपूर्ति राशि मिली, शेष इसके लिए दर-दर भटक रहे हैं।दिल्ली के अमीरों- मध्यवर्गीय लोगों के घरों के कूड़े उठाने वाले और उनकी गलियां-सड़़के साफ करने वाले सफाई कर्मचारियों के बारे में मैं सुनता रहा हूं कि देखो इन लोगों को कोरोना नहीं होता, इनका इम्युन सिस्टम इतना मजबूत है कि इनको कुछ नहीं होता।तथ्य इसके उलट हैं, आज के दी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के तीन मुंसिफल कार्पोरेशन ( MCD) के मरने वाले कुल 94 कर्मचारियों में 49 सफाई कर्मचारी हैं।होतो भी क्यों ने, जब अमीर और मध्यमवर्गीय लोग अपने-अपने घरों में दुबके हुए किसी भी सूरत में अपनी जान बचाने में लगे हुए थे, दबा कर खा-पी रहे थे, उसके बाद जो कूड़ा निकाल रहे थे, उसे कोई उसे उठा रहा था और साफ कर रहा था। वे यही सफाई कर्मचारी थे- जिसमें स्त्री-पुरूष दोनों शामिल थे।अमीरों-मध्यवर्ग को यह भी नहीं पता चलता कि उनकी गली में आने वाला या उनके सोसायटी को साफ करने वाला कौन सफाई कर्मचारी कब मर गया या गायब हो गया, क्योंकि अक्सर वे उनके चेहरों से नहीं, उसके झाडू और कचरे ठेले जानते और पहचानते हैं और एक के मरने के बाद कोई दूसरी झाडू वाली और कचरे का ठेला वाला तो, आ ही जाता है। एक मर जाता है, उसकी जगह कोई दूसरा ले लेता है। अमीरों और मध्यवर्ग का काम तो नहीं रूकता न।

अखबार की रिपोर्ट से यह तथ्य भी सामने आया कि इन 49 कर्मचारियों में सिर्फ इसमें सिर्फ एक या दो को केजरीवाल द्वारा घोषित 1 करोड़ की क्षतिपूर्ति की धनराशि मिली। केजरीवाल द्वारा एक सफाई कर्मचारी के परिवार को 1 करोड़ देते हुए फोटो देखकर लगा था कि सबको शायद 1 करोड़ मिल गया होगा।भारत में सफाई कमर्चारी अपने काम के स्वरूप ( श्रम) और सामाजिक श्रेणी दोनों आधारों पर तलछट के लोग माने जाते रहे हैं और आज भी हैं, तथ्य इसे प्रमाणित कर रहे हैं।ब्राह्मणवाद उन्हें उनकी सामाजिक हैसियत के आधार पर और पूंजीवाद उन्हें उनके श्रम के स्वरूप के आधार अंतिम दर्जे का मानता है। तथ्य यही प्रमाणित कर रहे हैं।

बहरहाल सवाल ये है कि सफाई कर्मचारियों के साथ भेदभाव क्यों? उससे भी बड़ा सवाल कोरोना महामारी के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों को कोई मुआवजा राशि क्यों नहीं मिल रही?

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